वट सावित्री व्रत 2018 - wikifeed
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वट सावित्री व्रत 2018: पति की लंबी उम्र और संतान की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखा जाता है

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वट सावित्री व्रत इस दिन पीपल या बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है … सवित्री व्रत की कथा

ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत मनाया जाता है. इस बार ये तिथि 15 मई 2018 को है. इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं. संतान की प्राप्ति के लिए भी इस व्रत को रखा जाता है. हिंदू धर्म में इस व्रत का खास महत्व है।

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वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ का विशेष महत्व है:

इस दिन पीपल या बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है. मान्यता के अनुसार, वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है. इसके नीचे सच्चे मन से पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस बार वट सावित्री व्रत की तिथी 14 मई 2018 को शाम 19:46 से शुरू हो गया था. पूजा के लिए शुभ मुहूर्त 15 मई को शाम 05:17 बजे तक रहेगा. इस समय के बाद पूजा न करें.

क्यों किया जाता है ये व्रत:

लोगों के बीच ऐसी मान्यता है इसी दिन सावित्री ने अपने कठिन तप के बल से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों का रक्षा की थी। कथाओं के अनुसार जब यमराज सत्वान के प्राण ले जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे पीछे चलने लगी। ऐसे में यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने एक वरदान में सौ पुत्रों की माता बनना मांगा और जब यम ने उन्हें ये वरदान दिया तो सावित्री ने कहा कि वे पतिव्रता स्त्री है और बिना पति के मां नहीं बन सकती। यमराज को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने चने के रूप में सत्यवान के प्राण दे दिए। सावित्री ने सत्यवान के मुंह में चना रखकर फूंक दिया, जिससे वे जीवित हो गए। तभी से इस व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है।

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ऐसे करें वट सावित्री व्रत में पूजा

  • वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की प्रतिमा स्थापित करते हुए वट वृक्ष की जड़ में पानी देना चाहिए।
  • पूजा के लिए जल, मौली,रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप होनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींचकर तने के  चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए।
  • इसके पश्चात सत्यवान सावित्री की कथा सुननी चाहिए।
  • इसके पश्चात भीगे हुए चनों का बायना निकालकर उसपर यथाशक्ति रुपये रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिए।

वट सवित्री व्रत की कथा:

कहते हैं कि भद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी. उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए यज्ञ करते हुए प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं. उन्होंने यह पूजा 18 वर्षों तक की. पूजा से खुश होकर सावित्रीदेवी प्रकट हुईं और उन्होंने राजा को वरदान दिया कि उनके यहां एक तेजस्वी कन्या जन्म लेगी. कन्या के जन्म के बाद उसका नाम सावित्री रखा गया.

सावित्री बड़ी होकर काफी रूपवान युवती बनी. योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे. उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा. सावित्री वर की तलाश में वन में घूमने लगी. उसी वन में साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे. उनसे उनका राज्य छीन लिया गया था, जिस वजह से वे वहां रहने को मजबूर थे. राजा द्युमत्सेन के साथ उनके पुत्र सत्यवान भी रहते थे. सत्यवान को देखने पर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया.

सत्यवान अल्पायु थे. नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी परंतु सावित्री उनकी बात नहीं मानी और सत्यवान से ही विवाह किया. सत्यवान को वेदों का ज्ञानी माना जाता था. सत्यवान ने सावित्री को भी वेदों की शिक्षा दी.

कथाओं के अनुसार जब यमराज सत्यवान की मृत्यु के बाद जब यमराज उनके प्राण ले जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे पीछे चलने लगी. यम ने उन्हें तीन वरदान मांगने के लिए कहा. सावित्री ने सबसे पहले अपने नेत्रहीन सास-ससुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु की कामना की. यम ने उन्हें कामना पूरी की. इसके बाद भी वे यम के पीछे चलती रहीं. दूसरे वरदान में उन्हें अपने ससुर का छीना हुआ राज्यपाठ वापस मिल गया, फिर भी सावित्री अपने यम के पीछे चलती रहीं. आखिर में उन्होंने सौ पुत्रों का वरदान मांगा. जब यम ने उन्हें ये वरदान दिया तो सावित्री ने कहा कि वे पतिव्रता स्त्री है और बिना पति के मां नहीं बन सकती. यमराज को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस दे दिए.

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